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Showing posts from April, 2024

मुसाफिर, नज़र, चेहरे।

राह से वाकिफ मुसाफिर को मैंने खोते हुए देखा है आंखों को जागते,  नज़र को सोते हुए देखा है आईने दिखाते नहीं है सच आज कल  मैंने हस्ते चेहरो को अकेले रोते हुए देखा है।

ग़ालिब।

छोटे कंकड़ से टूट गया शीशा तेरा ए ग़ालिब,  हमने तो सारी दुनिया ही पत्थर की देखी है।

साथी?

"धूप की साथी परछाई भी हाथ छुड़ा लेती है अंधेरे में, जिंदगी की शाम में नजारे कुछ यूं बदल जाते है"

कब्र।

मारा तो मुझको दुश्मनों ने ही है,  लेकिन कब्र तक ले जाने वाले मेरे अपने ही थे।

एक मुस्कुराहट ।

 मुस्कुराकर जीना तो हमने भी चाहा,  पर अफसोस मेरी कांच सी मुस्कुराहट और उनके पत्थर से शब्द...