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मुसाफिर, नज़र, चेहरे।

राह से वाकिफ मुसाफिर को मैंने खोते हुए देखा है आंखों को जागते, 
नज़र को सोते हुए देखा है आईने दिखाते नहीं है सच आज कल 
मैंने हस्ते चेहरो को अकेले रोते हुए देखा है।

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मन के भीतर।

कहे बुरा मैनू तू तू भी कभी मन में झांक, जो झांका तूने मन में दिखा तुझे एक शैतान , ओड़े जो चोला शराफत का और मुंह से कहे हु मैं इंसान ।