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साथी?

"धूप की साथी परछाई भी हाथ छुड़ा लेती है अंधेरे में, जिंदगी की शाम में नजारे कुछ यूं बदल जाते है"

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मन के भीतर।

कहे बुरा मैनू तू तू भी कभी मन में झांक, जो झांका तूने मन में दिखा तुझे एक शैतान , ओड़े जो चोला शराफत का और मुंह से कहे हु मैं इंसान ।